Vincent van Gogh

Why did Van Gogh cut his ear? (वान गो ने अपना कान क्यूँ काटा था?)

क्या आप जानते हैं कि कला इतिहास में एक एस भी कलाकार हुआ है जिसने अपना कान काट लिया था?  वो प्रसिद्ध व विचित्र कलाकार था – विंसेंट वन गॉग। क्या वो पागल था….? सनकी था…या किसी के प्यार का दीवाना था? कुछ लोग मानते हैं कि उसने अपनी प्रेमिका के लिए अपना कान काटा था और उसको गिफ़्ट में दिया था। क्या यही वजहें थीं या कुछ ओर भी ही राज़  थे।

चलिए इस राज़ के पीछे की कहानी से पर्दा उठते हैं. और पता लगाते हैं कि वान गो ने अपना कान क्यूँ काटा??

{अवश्य पढ़े: प्रभाववाद की कला, नव प्रभाववाद की कला, उत्तर प्रभाववाद की कला, क्लोड मोने (Claude Monet)}


येलो हाउस या स्टूडीओ ओफ़ द साउथ

Arles_Yellow House_Vincent Van Gogh
Arles_Yellow House_Vincent Van Gogh

कहानी के राज से पर्दा हटाने के लिए हमें वंचेंट वान गो के येलो हाउस चलना पड़ेगा। येलो हाउस वान गो द्वारा 1888 में किराए पर लिया गया घर था जो फ़्रान्स के अर्लेस शहर में था। अर्लेस शहर की अगर बात करें तो यहाँ के प्राकृतिक नजाए, बाग़-बगीचे, नदियाँ, सड़कें, जलपानगृह के आंतरिक दृश्यों ने वान गो को बहुत प्रभावित किया। आगे चल के ये सभी उसकी पेंटिंज़ में नज़र आए और इन्हीं पेंटिंग से वान गो ने अपने स्टूडीओ को सजाया था।

वान गो ने अपने किराए के घर येलो हाउस में एक बहुत ही महत्वकांक्षी स्टूडीओ तैयार किया था जिसको उसने स्टूडीओ ओफ़ थे साउथ नाम दिया। स्टूडीओ ओफ़ साउथ वान गो के सपनो का स्टूडीओ था जिससे वह भावनात्मक लगाव रखता था। वह इस स्टूडीओ को एक चित्रकार सदन के रूप में विकसित करना चाहता था। उसकी तमन्ना थी कि चित्रकारगण वहाँ आएँ, चित्र-साधना करे, विचारों का आदान-प्रादन करें, व एक दूसरे को प्रेरित करें।

इसी वजह से उसने अपने मित्र चित्रकार पॉल गॉगिन को अपने स्टूडीओ में आमंत्रित किया। वान गो पॉल गॉगिन का बहुत आदर व विश्वास किया करता था। अतः गॉगिन के स्वागत के लिए उसने बहुत ही दिल से अपने स्टूडीओ को सजाया। वान गो ने गॉगिन के लिए ख़ासतौर पर एक कुर्सी व एक पलंग ख़रीदा और एक कमरे को गॉगिन के लिए तैयार किया।

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what happened between Vincent van gogh & gauguin
Gauguin & van gogh

वान गो और गॉगिन (Gauguin)- विचार और स्वभाव

  • वे स्वभाव में बिल्कुल अलग थे। वैन गॉग, भावुक-सनकी और आवेगी क़िस्म के चित्रकार थे जबकि गॉगिन एक बौद्धिक और घमंडी क़िस्म का कलाकार था।
  • वास्तव में, वान गो गॉगिन को बहुत मानता था।
  • इसलिए वान गो ने अपनी चित्रण तकनीक में गॉगिन के विचारों से प्रेरित होकर कुछ परिवर्तन किए।
  • गॉगिन भी वान गो की कलात्मक दृष्टिकोण व व्यक्तिगत समस्याओं को समझता था।
  • गॉगिन ने वान गो को आवेशपूर्ण व प्रत्यक्ष चित्रण  करने से रोका।
  • गॉगिन ने वान गो को अपनी कला में खुद की कल्पना को भी शामिल करने की सलाह दी।
  • जबकि वान गो को वस्तु की प्रत्यक्ष जड़ को महत्व देते थे। कल्पना की अपेक्षा वस्तु इसी जड़ को वान गो ने स्वतंत्र माना।
  • यही वो वजह थी जो आगे चल के दोनो के बीच झगड़े की वजह बनी।

गॉगिन का आगमन

  • अंततः पॉल गॉगिन का येलो हाउस में आगमन हुआ।
  • पॉल गॉगिन एक सशक्त, प्रभावी और उतने ही ज़िद्दी कलाकार थे।
  • पोस्ट-इंप्रेशनिज़्म के दो दिग्गज, साथ-साथ पेंटिंग कर रहे थे।
  • यह कल्पना करना ही अपने-आप में रचनात्मक ऊर्जा से भारी हुई है! क्या माहौल रहा होगा वहाँ?
  • लेकिन वहाँ का वातावरण हमारी कल्पनाओं के विपरीत तनावग्रस्त था। दोनो स्वभाव से अलग थे।
  • उन दोनो के बीच कई बार कला की भयंकर चर्चाएँ हुई।
  • ये चर्चाएँ अति रचनात्मक दबाब के करण अक्सर गरमा-गर्म वाद विवाद में बदल जातीं थी.
  • परिणामस्वरूप स्टूडीओ ओफ़ द साउथ या येलो हाउस अब सुकून की जगह नहीं थी जिसकी कल्पना विंसेंट ने की थी।
  • अपितु यह एक तनावग्रस्त नकारात्मक स्थान के रूप में बदल चुका था।

दो दिग्गजों के बीच विवाद

the clash between Van Gogh & Gauguin
The clash between Van Gogh & Gauguin
  • दोनो ही दिग्गजों के बीच अक्सर विचारों का मतभेद व ज़िद सामने आने लगी।
  • पॉल गॉगिन, वान गो के अजीब बर्ताव और लगातार बढ़ते तनाव से जल्दी ही ऊब गए।
  • अंततः उन्होंने जाने का फ़ैसला कर लिया।
  • वैन गॉग के लिए, यह सिर्फ़ गॉगिन का जाना नहीं था। यह उनके पूरे सपने का टूटना था।
  • “स्टूडियो ऑफ़ द साउथ” की विचारधारा व कला सदन का अंत था।
  • वान गो अंदर से भावनात्मक रूप से टूटने लगे। उनके अंदर ही अंदर निराशा व आवेग का तूफ़ान उमड़ने लगा।
  • आख़िरकार 23 दिसंबर, 1888 की रात को, वो तूफ़ान भी उमड़ पड़ा।
  • दोनो दिग्गजों के बीच एक और ज़बरदस्त बहस हुई जिसने विवाद का रूप ले लिया।
  • इस बहस के बाद के बाद, गाउगिन बाहर चले गए।
  • इसके बाद जो हुआ वह आर्ट हिस्ट्री में दर्ज हो गया है।

कान काटने की घटना

  • वान गो अब अकेला और अंदर से टूटा हुआ सा निराश हो गया था।
  • पहले ही वह एक गंभीर मानसिक बीमारी से ग्रसित था।
  • अतः घोर निराशा व पूर्व की मानसिक स्थिति ने उसको वो काम करने को मजबूर किया जिसकी कोई कल्पना भी नहीं सकता था।
  • रेज़र का इस्तेमाल करके, उन्होंने अपने बाएं कान का एक हिस्सा काट लिया।
  • घटना के तुरंत बाद, हैरान-परेशान हालत में, उसने कथित तौर पर कटे हुए कान को कपड़े में लपेटा।
  • अपने काटे कान को एक लोकल कोठे की एक औरत को दे दिया।
  • अगली सुबह पुलिस को वह खून से लथपथ और बेसुध हालत में मिला।
  • यह सिर्फ़ गॉगिन से बहस के बाद गुस्से में उठाया गया कदम नहीं था।
  • बल्कि वान गो के अंदर पहले से चल रही असुरक्षा, अकेलेपन, तनाव, और उसकी मानसिक असंतुलन का नतीजा था।
Incident of Van Gogh's ear cutting
Incident of Van Gogh’s ear cutting

कारण

इस घटना की सबसे बड़ी वजह उसकी निराशा (frustration) थी। उसकी ये निराशा(Frustration) उसके जीवन में शुरू से चली आरहीं कई कारणों की वजह से थी। वे प्रमुख कारण थे:

  • मानसिक बीमारी: उसकी पहले से ही मानसिक बीमारी से ग्रसित था। जैसे कि बाइपोलर डिसऑर्डर (bipolar disorder), बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर (borderline personality disorder), और शायद टेम्पोरल लोब एपिलेप्सी (temporal lobe epilepsy)। इसी वजह से उन्हें साइकोटिक एपिसोड, भ्रम और डरावने मतिभ्रम हो रहे थे।
  • अकेलापन: अपनी मानसिक स्थिति, अजीब स्वभाव की वजह से उसके क़रीब बहुत ही कम लोग आए थे। उसके क़रीब केवल उसका भाई थीओ ही था। इसलिए वह अक्सर बहुत अकेला महसूस करता था।
  • पैसों की तंगी: उसके जीवन पर अगर नज़र डालें तो आपे पूर्व के कामों से या तो वो ठगा सा महसूस हुआ, या फिर असंतोष या फिर तनाव ग्रस्त। ज़ाहिर है कि इस स्थिति में उसकी वितीय स्थिति भी अस्थिर रही. अतः माली हालत पर वह लगातार अपने भाई थियो पर निर्भर था, जिससे उसकी चिंता और बढ़ गई थी।
  • थियो की सगाई: घटना से ठीक पहले, विंसेंट को पता चला कि उसके प्यारे भाई थियो की सगाई हो गई है। उसका सबसे क़रीब या एकमात्र व्यक्ति अगर कोई था तो वो थीओ ही था। कुछ इतिहासकारों का मानना ​​है कि उसे डर था कि वह थियो का अटूट साथ खो देगा, जो पहले से ही अस्थिर दिमाग के लिए एक बड़ा झटका था।

निष्कर्ष

अब आप जान ही गए होंगे कि वैन गॉग ने अपना कान क्यों काटा था?  इसका घटना का कोई एक कारण नहीं था। बल्कि एक इंसान के अंदर के जलते हुए ज्वालामुखी के फटने का परिणाम था। चित्रकार वान गो ने अनजाने में कला के माध्यम से अपने अंदर भड़क रहे ज्वाला मुखी को शांत करने के भरसक प्रयास किए।

लेकिन एक इंसान कब तक अपनी मानसिक बीमारी, अकेलेपन, जीवन की समस्याओं से लड़ सकता है। अंततः वो जीवन की इन समस्याओं से हार गया.

23 दिसम्बर 1988 को उसने अपना सिर्फ़ कान ही काटा था। मगर 1890 में इन्हीं सब चुनौतियों ने उसे खुद को ख़त्म करने को मजबूर कर दिया. आख़िरकार, बेचारा ये महान चित्रकार 1890 में खुद को गोली मार कर अपनी जीवन लीला को समाप्त कर लेता है।

अब उसके कान काटने या खुद को मार लेने को भले ही लोग कुछ भी कहें, मगर एक कलाकार ओर इंसान के लिए एक साथ इतनी चुनौतियों से लड़ पाना आसान नहीं होता। इन चुनौतियों के बावजूद वान गो के काम और उनकी बनयी पेंटिंज़ आज भी कलाजगत की महान कृतियाँ हैं।

इस चित्रकार को मेरा सलाम…!

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