वान गो अकेलेपन, संघर्ष, और रचनातमकता का नाम है। ये वो इंसान था जिसने निराशा और मानसिक बीमारी जैसे विपरीत माहौल में भी कला साधना जारी रखी। बच्चों की तरह साफ़ दिल के इस चित्रकार ने अपने जीवन में काफ़ी संघर्ष किया। कम समय में इनकी बनयी गयी कृतियाँ, कला के प्रति इनके लगन को देखती है।
चलिए इस महान चित्रकार के दुःखद, चुनौतियों से भरे रचनात्मक जीवन पर एक नज़र डालते हैं;
{अवश्य पढ़े: प्रभाववाद की कला, नव प्रभाववाद की कला, उत्तर प्रभाववाद की कला, क्लोड मोने (Claude Monet)}
प्रारम्भिक जीवन
वान गॉग का जन्म ब्रैबेंट क्षेत्र के एक छोटे से गौंव में हुआ था। इनके पिता एक प्रोटेस्टेंट पादरी थे। वान गॉग अपने छेः भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। स्वभाव से शांत वान गॉग प्राकृति प्रेमी थे और अपना ज़्यादातर समय प्राकृति के गोद में ही बिताते थे। बचपन से ही उनमें मानसिक अस्थिरता के लक्षण ज़ाहिर होने लगे थे।
अपने युवा अवस्था में उन्होंने एक कला डीलर के रूप में काम किया. वान गॉग अक्सर यात्राएँ किया करते थे। जब वे लंदन गए तो वहाँ वे अवसादग्रस्त (depressed) हो गए। शायद इस स्थिति से निकलने के लिए व आंतरिक शांति के लिए वे धार्मिक कामों में लग गए। दक्षिणी बेल्जियम में एक मिशनरी के रूप में काम करने लगे।
इस काम से भी वे अंततः दुखी व निराश होकर बीमार पड़ गए. वान गोग अपने भाई थीओ के काफ़ी क़रीब थे। थियो ने उनकी मानसिक व आर्थिक मदद की. दोनों के बीच लम्बे समय तक खूब पत्राचार चला।

भाई थीओ के प्रति प्रेम
- दोनों भाइयों-वान गो व थीओ में आपस में बहुत प्रेम था।
- विशेषकर वान गो के जीवन में अगर कुछ अच्छा और संतोषजनक था तो वो था थीओ जैसा भाई का होना।
- दोनों के बीच काफ़ी पत्रों का आदान प्रादन हुआ।
- भाई थीओ ने लगातार अपने भाई वान गो का ख़्याल रखा। 1886 में थीओ अपने भाई को पेरिस ले गया।
- 1888 की घटना के बाद भी थीओ ने अपने भाई का ख़्याल रखना जारी रखा।
- जब 1889 के आस पास वान गो को घोर निराशा व अपनी दुनिया नष्ट होती देख रही थी।
- तब भी थीओ ने उसका साथ दिया।
- वान गो को उत्साहित करने के लिए थीओ ने उसका एक चित्र-The Red Vineyard विक्रय करवाया।
- वान गो के जीवन काल में ये पहला व आख़री चित्र था जो बिका था।
- इसके बाद थीओ ने अपने भाई को ओवेर्स (पेरिस) में डॉक्टर गाशे के निरीक्षण में भेज दिया।
कलात्मक जीवन
इनके कलात्मक जीवन बहुत ही छोटा, दुःखद, चुनौतियों से भरा हुआ किंतु प्रभावी रहा है। इनकी कला यात्रा को हम तीन भागों में बाँट सकते हैं:
- प्रारम्भिक काल या डच काल (1880-1886)
- पेरिस काल (1886-1888)
- अंतिम समय का काल (1888-1890)
1. प्रारम्भिक काल या डच काल (1880-1886)
- 1880-1886 के मध्य वान गो बेल्जियम व नीदरलैंड में चित्रण किया।
- इसी समय को वान गो की कला का प्रारम्भिक या डच काल माना जाता है।
- इससे पूर्व का जीवन, वान गो ने एक संत के जैसे बिताया था।
- वे मजदोरों व किसानों के साथ रहा करते थे व उनकी सेवा करते थे।
- भाई थीओ से जो भी पैसे मिलते थे उनसे गुज़रबसर कर के किसानो व मजदोरों के साथ ही सो जाते थे।
- यही कारण है की इस समय के उनके चित्रों में किसान व मज़दूरों के जीवन की छलक देखने को मिलती है।
- इस समय के चित्रों में लोगों के दुःख, कठिन जीवन, ग़रीबी, अनाथालयान के दृश्य आदि के यथार्थ दर्शन होते हैं।
- इस काल की सबसे महत्वपूर्ण कृति पटेटो ईटर्ज़ रही है।
- अन्य महत्वपूर्ण कृतियों में – वुमन स्यूइंग (1881-82), वुमन विध वाइट शॉल (1882), फ़िशरमेन ऑन द बीच (1882), द स्टेट लोटरी (1882), द पटेटो मार्केट (1882)
- इस दौरान वान गो ने तीं महीने एण्टर्वप के कला संस्था में भी कला का अध्ययन किया।
2. पेरिस काल (1886-1888)
- 1886 में वान गो अपने भाई थीओ के साथ पेरिस आ गए।
- पेरिस उन्हें कई मायनों में रास आया। एक तो वे यहाँ कई प्रभाववादी व उत्तर प्रभाववादी चित्रकारों से मिले।
- इन चित्रकारों ने व वहाँ के कलात्मक माहौल ने वान गो के अंदर चित्रण करने का एक नया जोश भर दिया।
- वेसे तो पेरिस में वे कई कलाकरों से प्रभावित थे।
- मगर एमिल बर्नार्ड और पॉल गौगुइन से वे कुछ विशेष रूप से प्रभावित हुए।
- इस काल में उन्होंने पेरिस के रास्तों, जलपानगृहों, पोर्ट्रैट्स, पेरिस के रंगीन जीवन को अपने चित्रों में विशेष स्थान दिया।
- पेरिस काल के चित्रों में वान गो ने लाल, पीले, व नीले रंगों का शुद्ध रूप में प्रयोग किया।
- पेरिस काल की कृतियों की अगर बात करें तो – सेल्फ़ पोर्ट्रेट विध पाइप, पोर्ट्रेट ओफ़ पेर तेंग्व, द ओल्ड मिल, सी स्कपे ऐट सेंट मेरी, स्टेरी नाइट आदि प्रमुख हैं।
- इस समय तक उनके चित्रों की बिक्री नही होती थी।
- उनकी वित्तीय स्थिति थीओ पर ही निर्भर थी। दूसरी ओर पेरिस की रंगीनियत उनको अपनी अभिव्यक्ति के लिए ठीक नहीं लग रही थी।
- अतः 1888 में वे पेरिस से अर्लेस (फ़्रान्स) आ गए।
3. अंतिम काल (1888-1890)
- 1888 में वान गो फ़्रान्स के अर्लेस शहर में आ गए। यहाँ उनकी कला अपने चरमउत्कर्ष तक पहुँची।
- यहाँ उन्होंने एक जलपान गृह के ऊपर येलो हाउस को किराए पर लिया।
- येलो हाउस में उन्होंने अपना एक महत्वकांक्षि स्टूडीओ तैयार किया। इस स्टूडीओ को उन्होंने द स्टूडीओ ओफ़ द साउथ नाम दिया।
- वान गो चाहते थे कि उनका स्टूडीओ एक कला सदन के रूप में विकसित हो जहां कई चित्रकार आकार एक साथ काम करें. विचारों का आदान प्रादन करें.
- इसी कड़ी में उन्होंने पॉल गौगुइन को अपने स्टूडीओ में आमंत्रित किया. किंतु गौगुइन वहाँ जयदा ना रह सके ओर दोनो के बीच विवाद हो गया. इसी बीच वान गो ने अपना कान काट लिया.
(वास्तव में दोनो कलाकरों के बीच क्या विवाद हुआ था? वान गो ने अपना कान क्यूँ काटा था? ये जानने के लिए पूरा आर्डिकल पढ़े- वान गो ने अपना कां क्यूँ काटा? या ये वाला पूरा विडीओ देखें-)
- अर्लेस शहर के हरे-भरे खेत, रास्ते, नदी, पुल, बाग-बगीचे, सूरजमुखी के फूल आदि ने वान गो को चित्रण के लिए आकर्षित किया।
- यहाँ उन्होंने स्टिल लाइफ़, लंदकपे और पोर्ट्रेट खूब बनाए। इस समय वे गौगिन से काफ़ी प्रभावित थे। गौगिन के कहने पर उन्होंने प्रभाववादी चित्रण छोड़ दी।
- इसके बाद वान गो एंड गौगुइन के बीच विवाद हो गया ओर गौगुई चला गया। ये पूरी घटना आप इस आर्डिकल में पढ़ सकते हैं- वान गो ने अपना कान क्यूँ काटा?
- उस घटना के बाद वान गो को सेंट पॉल मेंटल हॉस्पिटल भेज दिया गया।
- यहाँ भी उन्हें दिमाग़ी दौरे पढ़ते रहे फिर भी ये चित्रकार कला की साधना करता रहा।
- इसी बीच 1889 में इन्होंने विश्व प्रसिद्ध चित्र स्टेरी नाइट को पूरा किया।
इस समय की प्रमुख कृतियाँ
- Self Portrait with babdged ear,
- Gurden of saint paul hospital,
- entrance to a quwari,
- fiel of yellow flowers,
- Portrait of dr flex rey,
- still life- vase with fifteen sunflowers,
- stone bench in the gurden of saint paul hospital,
- weat field with syprise thresher
दुःखद अंत
- 1890 में वान गो को डॉक्टर गोशे के निरीक्षण में भेज दिया गया।
- कला प्रेमी डॉक्टर गोशे के प्रेमपूर्वक व्यवहार ने वान गो को फिर से उत्साहित किया।
- अतः वान गो ने फिर से नए जोश के साथ चित्रकारी शुरू की। इस समय उसने ये महत्वपूर्ण चित्र बनाए- Portrait of dr. gaushe, roses & beetals, road with syprise & star, dr gaushe’s gurden, view of overs, with charch, to children, white house at night, pint roses in a vase, couse,
- गोली मारने के दो दिन बाद इस महान चित्रकार के जीवन का दुःखद अंत हुआ।
- 1890 में वान गो बाहर दृश्य चित्रण कर रहा था। इसी समय उसको मानसिक दौरा पड़ा।
- यह दौरा इतना ख़तरनाक व दर्दनाक था कि ये चित्रकार इसको बर्दाश्त नहीं कर सका।
- अपनी इस दयनीय अवस्था में इस चित्रकार ने खुद को गोली ली।

इस घटना की सबसे बड़ी वजह उसकी निराशा (frustration) थी। उसकी ये निराशा(Frustration) उसके जीवन में शुरू से चली आरहीं कई कारणों की वजह से थी। वे प्रमुख कारण थे:
निष्कर्ष
वान गो की कला जितनी प्रसिद्ध है उतनी ही प्रसिद्धि उनके कान काटने व आत्म हत्या की भी है। मगर शायद ही कम लोग जानते होंगे के इस चित्रकार का जीवन कितना संघर्षपूर्ण रहा होगा? जीवन की विपरीत परिस्थिति में लगातार कला कर्म करना कोई आसान काम नहीं होता है।
वान गो के जीवन को क़रीब से देखें तो ये इंसान बच्चों की तरह साफ़ दिल वला था। लोगों से प्रेम व उनकी सहायता करने वला था। खुद कि लिए कुछ ना रखने वला संत क़िस्म का व्यक्ति था।
मैं समझता हूँ कि ईश्वर ने या तो इसकी घोर परीक्षा ली है या फिर नाइंसाफ़ी की है. अब ये तो ईश्वर ही बेहतर जाने, मगर वान गो होना कोई आसान काम नहीं है। छोटे से चुनौतियों से भरे व दुखी जीवन में इतनी शानदार रचनाएँ करना वक़ई महान काम है।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि वान गो के जीवन से संघर्षपूर्ण नए चित्रकारों को काम करने की लगातार प्रेरणा मिलती रहेगी।
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